यज्ञ का महात्म्य

- आचार्य सुधांशु त्रिपाठी

यज्ञ का अर्थ है - शुभ कर्म, श्रेष्ठ कर्म, सत्कर्म और सर्वजन कल्याण कर्म है। ज्ञान की दृष्टि से यज्ञ योग की विधि है, जो परमात्मा का अभिन्न ज्ञान और अनुभव प्राप्त होने पर पूर्ण होती है। यह शुद्ध होने की क्रिया है। दुसरे शब्दों में यज्ञ का तात्पर्य है त्याग एवं बलिदान। अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान सुगंधित पौष्टिक द्रवों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याणार्थ यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है।

हमारे वेदों में 5 प्रकार के यज्ञों का उल्लेख है -

1 - ब्रह्म यज्ञ : भगवन अर्थात ब्रह्म यज्ञ नित्य संध्या, वंदन, स्वाध्याय तथा ध्यान करने से होता है। इस यज्ञ को करने से हमारे ऋषियों का ऋण उतरता है तथा ब्रह्मचर्य आश्रम शक्तिशाली होता है।

2 - देव यज्ञ : वेदी में अग्नि जलाकर एवं मंत्रोच्चार द्वारा घृत डालकर होम करने की विधि को देव यज्ञ कहते है। हवन में सात पेड़ो की लकड़ियाँ (आम, बरगद, पीपल, धाक, जारी, जामुन एवं शमी) सबसे उपयुक्त मानी जाती है। देव यज्ञ करने से देव ऋण से मुक्ति मिलती है एवं गृहस्थ आश्रम खुशहाल एवं शक्तिशाली बना रहता है।

3 - पितृ यज्ञ : माता-पिता, गुरुजनों की सेवा, पितरों के प्रति तर्पण और श्राद्ध पितृ यज्ञ कहलाता है। पितृ यज्ञ करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।

4 - वैश्वदेव यज्ञ : सभी जीवों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझकर उन्हें अन्न-जल देकर उनकी रक्षा करनी चाहिए। भोजन कक्ष में बनाये हुए अन्न के कुछ भाग से अग्नि मे होम करें, तत्पश्चात कुछ भाग गो, कुत्ते और कौवे को खिलायें। इसे वैश्वदेव यज्ञ कहते है। यह यज्ञ करने से घर में सुख एवं समृद्धि बनी रहती है।

5 - अतिथि यज्ञ : अनिश्चित समय व अकस्मात् घर आया व्यक्ति अतिथि कहलाता है। ऐसे व्यक्ति की पूर्ण मनोभाव से सेवा व सहयोग अतिथि यज्ञ कहलाता है। यह यज्ञ करने से सन्यास आश्रम बलवान होता है, परिवार की आर्थिक व सामाजिक उन्नति होती है।

यज्ञ की वैज्ञानिक महत्ता -
1 - यज्ञ की आध्यात्मिक महत्ता के साथ साथ वैज्ञानिक महत्ता भी है। मन्त्रों में अनेक शक्ति के स्तोत्र दबे रहते हैं। मंत्रोच्चारण से विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगे निकलती हैं जिनका प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर पड़ता है, सूक्ष्म जगत तथा प्राणियों के स्थूल ओ सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता है।
2 - यज्ञ के धुंए से निकलने वाले कण वायुमंडल में फैलते है जिससे हवा में घुमते असंख्य रोग के कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं। साधारण रोग एवं महामारी से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है। पशु-पक्षियों, वृक्षों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है।
3 - यज्ञ के धुंए एवं ऊष्मा से भूमि शुद्ध, विकार रहित एवं नकारात्मक ऊर्जा से विहीन हो जाती है।
4 - यज्ञ के प्रभाव से मनुष्य की बुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मो का निष्कासन होता है। इसलिये हमारे शास्त्रों में भी यज्ञ को पापनाशक कहा गया है।
5 - धार्मिक क्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल-विपेक्ष दूर होते हैं। फलस्वरूप तेजी से उसमे ईश्वरीय प्रकाश जगता है।
6 - वायु को हम मल, मूत्र, श्वास तथा कारखानों व उद्योगों के धुओं से प्रदूषित कर रहे हैं। यज्ञ से वायु शुद्ध होती है क्योंकि यज्ञ का धुआं वायुमंडल में जाकर कार्बन-डाई-ऑक्साइड के कण ओ प्राण वायु में परिवर्तित करता है।
7 - यज्ञ का धूम्र आकश में बादलों में जाकर खाद बनकर वर्ष के साथ पृथ्वी पर आता है जिससे परिपुष्ट अन्न, घाष तथा वनस्पति उत्पन्न होती है। जिनके सेवन से मनुष्य तथा पशु-पक्षी सभी परिपुष्ट होते हैं।
8 - यज्ञ में उच्चारित ध्यानियों का कम्पन उत्पन्न हो सुदूर क्षेत्रों में बिखरकर लोगों का मानसिक परिष्कार करता है। फलस्वरूप शरीर तथा मानसिक स्वास्थ्य सुधरता है।
9 - इसके अतिरिक्त अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए आज और आज से पूर्व भी राजाओं - ऋषियों द्वारा यज्ञ करवाये जाते रहे थें। राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया था। श्रीराम ने भी अश्वमेघ यज्ञ करवाया था। आज भी लोग अपने समस्याओं का समाधान हेतु यज्ञों का आयोजन करवाते हैं। यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है। यज्ञ आयोजनों से एकता, सामूहिकता और सहकारिता की भावनाएं विकसित होती हैं।


फेसबुक पेज

अन्य समाचार