
शिखा (चोटी) रखने और उसमें गांठ बांधने की प्रथा क्यों!
हिंदू धर्म के साथ शिखा का अटूट संबंध होने के कारण चोटी रखने की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। शिखा का महत्व भारतीय संस्कृति में अंकुश के समान है। यह हमारे ऊपर आदर्श और सिद्धांतों का अंकुश है। इससे मस्तिष्क के पवित्र भाव उत्पन्न होते हैं।
शिखा का परिमाप धर्मग्रंथों में गोखुर अर्थात गाय के खुर जितना बताया गया है।
यत्र बाणा: सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव।
विशिखा का अर्थ है- गोखुर के परिणा की शिखा वाले।
कात्यायनस्मृति में लिखा है-
सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च।
विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम।।
अर्थात बिना शिखा के जो भी यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि शुभ कर्म किए जाते हैं, वे सब निष्फल हो जाते है।
यहां तक कि बिना शिखा के किए गए पुण्य कर्म भी राक्षस कर्म हो जाते हैं-
विना यच्छिखया कर्म विना यज्ञोपवीतकम्।
राक्षसं तद्धि विज्ञेयं समस्ता निष्फला क्रिया:।।
इसलिए मनुस्मृति में आज्ञा दी गई है-
स्नाने दान जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने।
शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येततन्मनुरब्रवीत।।
अर्थात स्नान, दान, जप, होम, संध्या और देवपूजन के समय शिखा में ग्रंथि अवश्य लगानी चाहिए। पूजा पाक के समय शिखा में गांठ लगाकर रखने से मस्तिष्क में संकलित ऊर्जा तरंगें बाहर नहीं निकल पाती हैं। इनके अंतर्मुखी हो जाने से मानसिक शक्तियों का पोषण, सद्बुद्धि, सद्विचार आदि की प्राçप्त, वासना की कमी, आत्म शक्ति में बढोतरी, शारीरिक शक्ति का संचार, अवसाद से बचाव, अनिष्टकर प्रभावों से रक्षा, सुरक्षित नेत्र ज्योति, कार्यो में सफलता तथा सदगति जैसे लाभी भी मिलते हैं।